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gopalagarwal


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Posted On: 1 Oct, 2011  
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शामली का विकास

Posted On: 1 Oct, 2011  
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अव्यवस्थित अर्थ

Posted On: 19 Sep, 2011  
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राजा और नेता

Posted On: 12 Sep, 2011  
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मेरठ विश्ववद्यालय को मिलिट्री की तैनाती चाहिए

Posted On: 7 Sep, 2011  
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डा० लोहिया

Posted On: 1 Sep, 2011  
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वकील साहब मुझे डराते हैं

Posted On: 23 Aug, 2011  
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व्यापारी को मिटाने की साजिश

Posted On: 23 Aug, 2011  
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वैकाल्पिक राजनीति

Posted On: 23 Aug, 2011  
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विदेशी पूंजी से मची तबाही

Posted On: 23 Aug, 2011  
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के द्वारा:

के द्वारा:

मैं जनसेवा को आपदा प्रबन्धन से जोड़कर भी देख रहा हूँ। पहाड़ो पर हुई तबाही कुदरती है या इंसानी छेड़छाड़ का नतीजा, परन्तु हिमालय की वादियों में तूफान तो आया ही था। संकट के इस समय आलोचना या समालोचना से उत्तम जन सेवा धर्म का प्रवर्तन है। व्यवस्था से जुड़ा होने के कारण यह राजनीति का एक भाग है। मैं स्पष्ट कर दूं कि राजनीति को लोग कपट, चाल या पैतरे बाजी समझ कर अज्ञानता के रसाताल में जा रहे हैं। राजनीति का सम्बन्ध उन नीतियों से है जो ‘राज’ के लिए आवश्यक है। इन नीतियों में भेद ही विभिन्न राजनीतिक दलों का गठन कराता है। यह एक स्वस्थ्य परम्परा है। स्वन्त्रता से पूर्व कांग्रेस पार्टी ‘सेवा दल’ की भूमिका में रही। जब-जब आपदा आती कार्यकर्ता आपदा प्रबन्ध में लग जाते। महामारी, हैजा, प्लेग में बापू तक की परमार्थ सेवा में एक कार्यकर्ता के रूप में सेवा करने के उदाहरण हैं। सटीक लेखन

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat




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