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लोकतांत्रिक पद्धति

Posted On 6 Oct, 2017 में

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भारत व्यवहारिक रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था का देश है फिर भी विगत 70 वर्षो से प्रयोग में लायी जा रही व्यवस्था से जनता संतुष्ट नहीं वरन कुंठित है। सरकारें व्यस्क समान मताधिकार से निर्वाचित हैं परन्तु आम जनता के रोजमर्रा के सरोकार पर सरकारी तंत्र जनता को गुलामों की तरह धिक्कारता हुआ लगता है।
इन सत्तर वर्षों में संसद के अन्दर राजनीतिक दलों की स्पष्ट अभिव्यक्ति नहीं हो सकी है। जिम्मेदारी का अभाव वैकल्पिक नीति प्रस्तुतीकरण के अनुपस्थिति के कारण है। विपक्ष जिन मुद्दों पर विरोध करता है सत्ता में आने पर वही लागू करता है। सी.बी.आई. को पिंजरे का तोता नामकरण कर भाजपा ने खूब उछाला तथा इसे केन्द्र सरकार के नियन्त्रण से बाहर करने के बात रखी परन्तु अब सत्ता वाली भाजपा निज हित में उसे और भी अधिक प्रयोग करना चाहती है। जी.एस.टी. भाजपा विरोध के शीर्ष बिंदु पर था। अब कांग्रेस के विरोध का विषय बन गया। सबसे अधिक बचकानापन उन बहसों में देखने को मिला जब किसी गलती के लिए टोकने पर पिछली सरकार की एैसी ही हरकतों को आधार बनाकर बचाव किया गया। परन्तु जनता देख-सुन रही है। कांग्रेस ने गलतियाँ की थी इसीलिए लोग रूष्ट हुए, यदि वही गलतियाँ भाजपा दोहरायेगी तो लोग उससे भी रूष्ट होगें। इन बातों से उबरने का एक ही मार्ग है कि विपक्ष विरोध करते में वैकल्पिक दस्तावेज रखे कि जब वे सरकार में आयेगें तो नीति का प्रारूप किस प्रकार होगा तथा सरकार में अवसर मिलने पर उस प्रारूप को स्वीकार या लागू नहीं करना वादा खिलाफी की कानूनी बंदिश के अन्तर्गत होगा। एैसा नहीं कि कभी बदलाव के लिए कार्य नहीं हुआ, परन्तु वे बहुत थोड़े हैं, जैसे मधुदंडवते ने रेल में किया। गुरूपदस्वामी ने दवा के दाम न बढ़ने देने की जिद पकड़ कर किया। दूसरे प्रकार के परिवर्तन दूर संचार व आई.टी. सेक्टर में हुए।
तमाम दुनिया में सुधार कार्यक्रमों को प्रगतिशील फ्रेम पर लेने के लिए दो अवधारणाएँ प्रस्तुत कर दीर्घकालीन समाधान निकालने की बहस उन्नीसवीं शताब्दी में खूब चली जिसमें पूँजीवाद व साम्यवाद के दो खंभे बने। अठारवीं सदी से ही राजा की सत्ता बनाम लोकतन्त्र की बहस शुरू हो गयी थी। मंथन के लिए प्रारम्भ में दो फ्रेम बने थे। एक ओर मार्क्स द्वारा पूँजीवादी व्यवस्था को गिरा देने की अवधारणा थी जो राजा की सत्ता अथवा सत्ता पर पूँजीवाद के नियन्त्रण के कारण जनता को कठोर यातनाओं में देखते थे। दूसरी ओर पूँजीवादी व्यक्ति लगातार प्रयासरत थे कि पूँजी पर नियन्त्रण करने वाले के पास ही सत्ता की डोर रहे जिससे अर्थ दोहन कार्य में वैधानिक रूकावट न आ सके। किन्तु, उन्नीसवीं सदी के मध्य गाँधी, नेहरू व लोहिया ने ताबड़तोड़ साम्यवादी व पूँजीवादी अवधारणाओं को तथ्यात्मक तौर पर खारिज कर समाजवादी मार्ग की व्याख्या की। दरअसल भारत की कृषि, जलवायु, अनेकों धर्मों से जुड़ी एकात्मक संस्कृति, अनेकों भाषाएँ व उनमें भी पृथक बोलियाँ रहन सहन आदि को साथ लेकर प्रगति व समतामूलक समाज की स्थापना समाजवादी व्यवस्था के अन्तर्गत ही सम्भव है। विदेशी अवधारण की नकल भारत में नहीं चल सकती। समाजवादी व्यवस्था के मुख्य तत्वों में अभिव्यक्ति की आजादी, अवसरों की समानता, जनता को स्वास्थ्य व शिक्षा की राज्य द्वारा सुरक्षा व समान मताधिकार प्रयोग कर सत्ता का चुनाव है। इसमें न तो पूँजी एकाधिकार को कोई जगह है और न ही साम्यवादी तानाशाही का निर्माण है।
अग्रेजों से सत्ता हस्तांतरण के समय हडबड़ी में पूर्व में प्रचलित कानून संहिताओं का प्रवर्तन जारी रखा गया किन्तु देश का संविधान बनाने के लिए बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी की अध्यक्षता में संविधान सभा का गठन किया गया। संविधान सभा में वास्तविक रूप से गम्भीर बहसें हुई। आजादी के बाद के शासकों को धीरे-धीरे आभास होने लगा कि सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाए रखने के लिए अंग्रेजों के जमाने के कानून बेहतर हैं, भले ही बदलते समय में वे जनता के ‍लिए सहज न हो।
संसद में अब जो भी कुछ कहा सुना जा रहा है उसमें संविधान सभा की बारीकियों का अभाव है। कल तक आधार, जी.एस.टी., आभूषण पर उत्पादन शुल्क को सिरे से खारिज करने वाली भाजपा, कांग्रेस के पदचिन्हों पर है। उसी प्रकार विपक्ष में आयी कांग्रेस इसके विरोध में खड़ी है। कल तक जो पूँजीपति कांग्रेस की चौखट पर थे उन पर भाजपा के भृकुटि ढेढ़ी थी, आज वे भाजपा दरबार के रत्नों में से है।
सुधार कार्यक्रम आरम्भ करने से पहले जनता भी यह समझे कि राजनीतिक दलों के प्रति घृणा या मोह रखना व्यर्थ है। सभी राजनीतिक दल संविधान प्रदत्त अधिकार से गठित हुए हैं। जनता का विरोध केवल उन नीतियों से है जो करोड़ों भारतवासियों को त्रस्त रखे हुए है। केवल विरोध के लिए शोर या नेताओं को गददी से घसीट देने की कुंठा पालने वाले केवल तमाशा खड़ा कर रहे हैं। हम लोकतंत्र के नये प्रयोग में अमरीका, ब्रिटेन या स्पेन जैसे देशों को पछाड़ देना चाहते हैं। हमारा लोकतंत्र समय की दौड़ के साथ प्रगतिशील बने इसके लिए जब हम आलोचना का ज्ञापन किसी सरकार को देंगे तो साथ में सुधार क्या होना चाहिए इसकी भी योजना देंगे। लोकतंत्र प्रणाली के उदर्ध्व (वर्टिकल) विकास व शासन व्यवस्था में भारत को विश्व नेता बनाना हमारा लक्ष्य है।

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