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कृषि व व्यापार के कष्ट दूर करने होंगे

Posted On: 3 Feb, 2016 में

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प्राचीन भारत से लेकर अब तक हमारी अर्थव्यवस्था कृषि व कुटीर उद्योग आधारित रही है। हमारे खेतों में उगने वाले खाद्यान और खुदरा व्यापार की दुकानों ने ही हमें विश्व में अतुलनीय अर्थव्यवस्था दी है। इसी अर्थव्यवस्था के चलते हमने विश्वव्यापी मंदी से मुकाबला किया और सफल भी रहे। इस अर्थव्यवस्था से देश की आधी से अधिक आबादी जो गांवों में बसी है व बीस करोड़ की शहरी आबादी का गुजर बसर होता है। जिन बचत राशियों के आधार पर मंदी से बचने के दावे किए जा रहे है, वह इसी आबादी की डाकघरों व बैंकों के बचत खातों की धनराशि है। हालांकि विदेशियों की पूरी नजर इस बचत की धनराशि पर है। खतरनाक बात तो यह है कि ढाई सौ वर्ष पूर्व मात्र एक ईस्ट इंडिया कंपनी भारत को लूटने के लिए आई थी परन्तु वर्तमान में भारत के बाजार पर अनेकों विदेशी कम्पनीयाँ आधिपत्य के लिए तैयार हैं। भारत के सोलह करोड़ परिवारों ने अगर सौ रूपया महीना भी बचाया है तो सोचा जा सकता है कि यह रकम महीने में या साल भर में कितनी होगी?
विदेशी पूंजीपति किसान व खुदरा व्यापारी का हजारों साल पुराना रिश्ता तोड़ देना चाहते हैं। वे श्रंख्ला को तोड़कर सीधे उपभोक्ता तक पहुंचना चाहते हैं। इस उपभोक्ता को वह सब कुछ बेचा जाएगा, जिसकी उसे जरूरत भी न हो। जब उपभोक्ता की सारी बचत समाप्त हो जाएगी तो उसे उधार भी दिया जाएगा। यह सब बचत के खजाने को लूटने के लिए किया जा रहा है और इसमें षडयन्त्र है। विदेशी कम्पनीयाँ अपने देश के व्यापार घाटे को संतुलित करने के लिए भारतीय बाजार की दैनिक आवश्यकताओं में अपने उत्पाद बेचना चाहती है। कहीं से कपड़ा तो कहीं से जूता, कहीं से चाय कॉफी तो कहीं से डॉक्टर इंजीनियर उनके लिए जा रहे हैं। निर्यात कम व अधिक आयात होने की वजह से अमेरिका पर दुनिया में सबसे ज्यादा कर्ज है, जिसे उतारने के लिए उसकी कंपनियों की नजर, हमारे इस खजाने पर है। यह तभी संभव है जब देशी व्यापारीयों का अस्तित्व खत्म कर दिया जाए। और ऐसा हो भी रहा है, केंद्र सरकार एक के बाद एक बेतुके कानून बनाए जा रही है। अमेरिकी कंपनी वालमार्ट का ही उदाहरण लें। वालमार्ट जैसी कंपनी के भारत में खुदरा व्यापार की अनुमति देना न सिर्फ देश के स्थानीय बाजारों को खत्म करने की, बल्कि भारत की रीढ़ बनी बचत व्यवस्था को भी लूट की छूट देने की अनुमति देना है।
दूसरी ओर मंहगाई सबसे बड़ी समस्या बन गयी है। विदेशी कंपनी को खुदरा व्यापार की अनुमति देने व स्थानीय बाजार को खत्म करने से महंगाई और बढ़ेगी इससे बचत पर विपरित प्रभाव पड़ेगा।
बढ़ते टैक्स ने नहीं बल्कि उस टैक्स को चुकाने तक की प्रक्रिया ने व्यापारी की कमर तोड़कर रख दी है। सवाल पैदा होता है कि हम दुनिया भर की विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए मुक्त व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं, सेज-{स्पेशल इकोनॉमिक जोन} बना रहे हैं। परन्तु देशी व्यापार पर जकड़न भरे नियम लागू हो रहे है सरकार की तरफ से संरक्षण प्राप्त सट्टा बाजार इस महंगाई में घी का काम कर रहा है। इसे रोकने के लिए केंद्र सरकार कुछ भी नहीं कर रही है।
हमें साफ दिखाई दे रहा है कि इस तरह की स्थितियां बनने से न सिर्फ देश के व्यापारी बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि कुल आबादी में से तकरीबन सौ करोड़ की जनता भी त्रस्त है।

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