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जी.एस.टी. नियमावली पर पुन: विचार

Posted On: 30 Nov, 2015 Others में

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जी.एस.टी. नियमावली पर पुन: विचार
वस्तु एवं सेवाकर अन्तिम उपभोक्ता पर लगने वाला कर है। सरकार के समक्ष राजस्व संसाधन जुटाने के लिए दो मुख्य स्त्रोत हैं। पहला जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु या सेवा का उपयोग करे। {उत्पादन शुल्क, वैट व सेवाकर} दूसरा सामान्य मानक से व्यक्ति की आय से अंश प्राप्त किया जाय। {आयकर}
उपभोग के सिद्धान्त पर जी.एस.टी. बिक्री कर से बेहतर विचार है तथा विश्व में अभी तक की कर परिकल्पनाओं में सर्वोत्तम पद्धति है। उपयोग का कर होने के कारण कर प्रदान करने का दायित्व अन्तिम उपभोक्ता पर है जिसे एकत्रित करने वाला व्यक्ति अन्तिम विक्रेता ही होगा। यह अन्तिम विक्रेता विक्रय कड़ी का अन्तिम दुकारनदार है जिसका स्वरूप सामान्यत कस्बे गली का विसायती अथवा बिजली, हार्डवेयर या मैडीकल स्टोर जैसा ही होगा। भारत में अभी छोटी पूंजी के घरेलू रोजगार के रूप में चल रहे ऐसे व्यापार कम्प्यूटर तकनीकी तौर पर आगे बढ़ने में सक्षम नहीं हैं। इस बात का समर्थन कोई भी भारतीय अर्थशास्त्री नहीं करेगा कि रोजमर्रा की वस्तुओं का विक्रेता कोई बड़ी कंपनी वाला हो। यदि दुकानदारों की संख्या को समेट कर विकल्प में बड़े मॉल बना दिए जायं तो भारत में नौ करोड़ व्यापारीयों का बड़ा भाग परिवार सहित बेरोजगार हो जायेगा। तब वर्तमान की चार करोड़ से अधिक बेरोजगारों की संख्या में पचास हजार प्रतिमाह की हो रही बढ़ोत्तारी में करोड़ों और जुड़ जायेंगे। बेरोजगारी एवं पिछड़ापन साथ-साथ चलते हैं। एक मीनार के नीचे चारों ओर टाट-पालीथीन बिछा कर जिन्दगी गुजारने वाले लाखों परिवारों का समूह हो तो इलाका विकसित नही माना जा सकता। अर्जुन सेन गुप्ता आयोग की रिपोर्ट है कि बड़े उद्योगों में पूंजी बढ़ाने के साथ रोजगार कम हुए। इस आधार पर विकसित व दबे कुचलों के बीच कोसों की दूरी वाली खाई बढ़ती जायेगी।
मूल आवश्यकता छोटे दुकानदारों के आस्तित्व को कायम रखने व उन्हें विकास के ऐजेन्डे पर लाने की है। इसके लिए सामूहिक सुविधा केन्द्र खुलवा कर संतुलन बनाया जा सकता है। प्रत्येक इलाके में सामूहिक सुविधा केन्द्रों की समुचित संख्या प्रारम्भ से ही स्थापित करा दी जाय जिससे वहॉ भ्रष्टाचार की काई न लग सके। इन सुविधा केन्द्रों के संचालन का दायित्वा क्षेत्र के ही बेरोजगार युवकों को अल्पकालीन प्रशिक्षण दिलाकर सौंपा जा सकता है। प्रत्येक कार्य की फीस विभाग तय करेगा। बिना तैयारी किसी भी कार्य का प्रारम्भ शिशु हत्या के समान होगा।
एक अन्य आवश्यक तथ्य नियमावली के सरलीकरण का है। विधिक सूत्र इतने सुस्पष्ट होने चाहिए कि भविष्य में उनकी सामान्य व्याख्या के लिए विधि विशेषज्ञों की आवश्यकता न हो। इससे अदालतों पर भी अनावश्यक भार नहीं पड़ेगा।
भारतीय दर्शन में कर के लिए स्पष्ट कल्पना है कि जिस प्रकार भंवरा फूल से पराग का एक कण बिना फूल को चोटिल किए उठाता है वैसे ही जनता से कर लिया जाय। कर राशि देते समय उपभोक्ता को न लगे कि जेब काट ली गयी है। एकत्रीकरण करने वाली वास्तविक ऐजेन्सी अर्थात् अन्तिम विक्रेता नियमावली की जटिलता के मकड़जाल में फंसना नहीं चाहिए।
अभी वस्तु एवं सेवाकर की प्रस्तावित नियमावली में बहुत-सी त्रुटियां हैं। यह वैट से भी अधिक उत्पीड़नकारी सिद्ध होगा। सर्वाधिक चिन्ता कर की एकल प्रणाली की विचारधारा से भटकने की है। कांग्रेस व भाजपा दोनों के द्वारा प्रचारित किया गया कि तीन टैक्स {उत्पादन शुल्क, सेवाकर व वैट} के स्थान पर केवल एक जी.एस.टी. हो जायेगा। परन्तु इसका प्रस्तावित प्रारूप चार टैक्स की व्याख्या करता है पहला केन्द्रिय वस्तु एवं सेवाकर, दूसरा अन्तर्राज्जीय वस्तु एवं सेवाकर, तीसरा राज्य वस्तु एवं सेवाकर तथा चौथा अतिरिक्त कर। अर्थात् तीन के स्थान पर बढ़ाकर चार टैक्स व पंजीकरण दो स्थानों पर तथा कर निर्धारण भी दो स्थानों पर अलग-अलग होंगे जिनका इनपुट भी पृथक-पृथक गणना से पृथक-पृथक शीर्षक में रहेगा।
मेरा इरादा जी.एस.टी. का विरोध कर उद्योगों को हतोत्साहित करने का नहीं है वरन् उद्यमी व व्यापारी चाहे वे किसी भी स्तर के हो जी.एस.टी. को लागू करने से पहले नियमावली को लेकर गोष्ठियां व बहस करें। बहुत कम नेताओं को व्यापारिक विधेयकों में रूचि रहती है। जल्दी में आधुनिक फैशन के फेर में कई बार यहां की जलवायु के विपरित असुविधाजनक कपड़े सिल जाया करते हैं। एक बार कानून बनने के बाद असंगत नियमावली व भ्रष्टाचार में खाद की तरह काम करने वाले प्राविधान व फार्म से उपजे असंतोष का ठीकरा राज्य सरकार व उसके अधिकारीयों पर फूटेगा।

गोपाल अग्रवाल
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