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जनता की टूटती उम्मीदें

Posted On: 3 Nov, 2015 Others में

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राजनीतिक व्यवस्था मनुष्य को सभ्य, अहिंसक समान अवसरों के साथ पारदर्शी प्रतिस्पर्धा के वातावरण में विकास का अवसर देती है। किन्तु, इससे भी पूर्व मनुष्य को जीने के लिए आवश्यक हवा, पानी, भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा व आमोद के अवसर भी चाहिए जिसके लिए सराकरें विभिन्न नियमावली बना कर प्राकृतिक स्त्रोंतों पर नियन्त्रण करती हैं।
शुद्ध हवा के लिए प्रदूषण नियन्त्रण व जीवनधर्मी पर्यावरण चाहिए। पानी के लिए जगत-पालनी नदियां साफ तथा कुंए आबाद रखे जायं। वर्तमान कुंए से अर्थ पुराने देशी कुंए के साथ बोर पम्प से भी है। भोजन का अर्थ उस खनिज व विटामिन युक्त पोष्टिक भोजन से है जो प्राणी को कुपोषण से बचा कर रखे। सरकार को खाद्य सुरक्षा निर्धारित करने के लिए उपजाऊ भूमि व दुग्ध देने वाले पशुधन के कटान को सख्ती से रोकने के नियम भी बनाने है। आस्था का प्रतीक गाय व वन संरक्षित जीव जन्तु किसी भी दशा में नहीं मारे जायेंगे। स्वास्वथ व शिक्षा संविधान द्वारा प्रत्येक नागरिक को प्रदत्त अधिकार हैं। यद्यपि संविधान में इन्हें नीति निर्देशक सिद्धान्तों के अन्तर्गत लिया हुआ है परन्तु, यह संविधान बनाते समय का विचार था जब आर्थीक स्त्रोत ढूढ़े नहीं मिल रहे थे। अब वैसी परिस्थितियां नहीं हैं। परन्तु स्वास्थ्य व शिक्षा के क्षेत्रों को सरकारों ने अपने संस्थानों को निकम्मा कर निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने का मन बना लिया है। आमोद प्रमोद में परम्परागत मेले आदि संजीदगी के साथ सुव्यवस्थित कराये जा सकते हैं। इतना तो जरूरी है कि बच्चों को सुबह-शाम बैठने, खेलने के लिए स्वच्छ पार्क मिल जायं।
अभी हम जीवन से जुड़े मूलभूत तत्वों तक ही चर्चा कर रहे हैं परन्तु इन बुनियादी बातों की तरफ भारत सरकार द्वारा सुधार के रूप में कोई उपलब्धि नहीं है। यद्यपि ये अनिवार्य कार्यो की श्रेणी में हैं।
अब हम राजनीतिक सिद्धान्तों व प्रचारित विषयों का विश्लेषण करें। बेरोजगारी व मंहगाई निरंतर बढ़ रही हैं। बूंद-बूंद पानी की तरह पूंजी के लिए तड़पते किसान व छोटे व्यापारी को दरकिनार कर बड़े औद्योगिक घरानों को ऋण सुविधाओं के अमृत कुंड उपलब्ध हैं। पूंजी के निर्मल प्रवाह को नदी की बहती धार पर बांध लगाकर दिशा बदलने जैसे पूववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यो को वर्तमान भाजपा सरकार ने भी जारी रखा। पूंजी का प्रवाह विपणन और वितरण की तरफ होना चाहिए जिससे सामान्य जनता को दैनिक उपभोग की वस्तुएं सुलभता से मिलती रहें परन्तु बड़े औद्योगिक घरानों के उत्पादों को बिकवाने के लिए पूंजी को कार लोन जैसी योजनाओं की तरफ मोड़ा जा रहा है। बेवजह कर्ज में ली हुई कार लेने वाले व वायदा कारोबार {एमसीएक्स} पर सट्टा लगाने वालों के भविष्य दरिद्रता में बदले जा रहे है लेकिन सरकार को इस पर रोक लगा कर इन्हें बचाने की कोई सुध नहीं है। विकास की बोलचाल वाली परिभाषा में बड़े मॉल व बहुमंजिले इमारतें हैं चाहे उनकी तली के पास कुपोषित महिला और स्कूल से वंचित बच्चे खुली धूप या बरसात में रहने को मजबूर रहें।
बिजली बनती है बटती है किन्तु उपभोक्ता तक कितनी पहुंची इसका कोई हिसाब नहीं है। बताया गया है कि मध्य प्रदेश छतीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्र में बिजली की लाइन कहां तक जाती है इसका सत्यापन नहीं है कोयला किसको कितना देना है यह राज्य सरकारों को तंग करने के हिसाब से है। इससे स्त्रोतों का न तो समान बटवारा होगा न अर्थव्यवस्था सभी को पोषित कर पायेगी। वही पुराने ढर्रे की पुलिस की ट्रेंनिग, वही सीबीआई, वही अनियमित रेल बिना बदलाव के पुराने तरीके से ही सब कुछ चल रहा है। उन्नतीस रूपये की स्पीड पोस्ट से फास्ट पन्द्रह रूपये का कोरियर है। वही साज वही राग, वही नोन तेल, वही दाम, कुछ बदला है तो बस राग के स्वरों में झूठ को घोला गया है।
हम मानते हैं कि किसी भी सरकार के पास जादुई छड़ी नहीं है। इसके साथ यह भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि सरकारों को पहले ही दिन से लोक कल्याणकारी कार्य करने होंगे। भारतीय जनता पार्टी को उन विज्ञापनों व घोषणाओं को याद करना चाहिए जिनसे जनता को उम्मीद बंध गयी थी। अब उम्मीदें टूट रही हैं। भारी भरकम बहुमत प्राप्त करने के उपरान्त श्रीमती इंदिरा गांधी से भी जब जनता की उम्मीदें टूटी थीं तो सत्ता बिखरते देर न लगी।
गोपाल अग्रवाल

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