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तीसरी क्रान्ति: राजनीति को बन्धन मुक्त कराना

Posted On: 5 Mar, 2011 Others में

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जरा सोचें, क्या वास्तव में हमने अपने एम०एल०ए० तथा एल०पी० का चुनाव किया है? हमारी मजबूरी तो उन पाँच-सात व्यक्तियों में से एक को वोट देने की थी जो हमारे सामने विभिन् राजनैतिक दलों द्वारा थोप दिए गये थे। उनमें से एक को चुनने जैसे मजबूरी या जैस किसी ने आदेश दे दिया हो कि चार कुओं से एक में कूदना का चयन, मौत चारों में निश्चित है।
राजनीतिक दल उम्मीदवार थोप रहे हैं। दल उनकी आर्थिक स्थिति का आंकलन कर टिकट देते हैं जिसमें पैमाना चंदा है या फिर भुजाओं का बल एवं निजी सैन्य संगठन का आकार देखा जाता है। चुन लिये जाने पर उनकी प्रतिबद्धता दल की नीतियों में न होकर सरकार के जोड़-तोड़ में पार्टी का साथ देने की रहती है। बाकी समय में वे अपने सम्पर्क से व्यापार व धन-धान्य की वृद्धि करते रहते हैं।
हमारी समस्याओं के समाधान के लिए क्या किया? इसका उत्तर अब सामाजिक नही रहा। संक्षेप में उन चार उम्मीदवारों में से एक को शिखर का रास्ता मिल गया परन्तु राजनीति अपनी राह से भटक गयी। अब यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि आचरण की शुद्धता का कोई नेता पैदा होगा। गांधी, सुभाष, आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नरायन, डा० लोहिया आन्दोलनों से निकले नेता थे। क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद व सरदार भगत् सिंह को व्यवस्था के दमन की आग ने इतना तपाया कि वह तरूणाई में ही अन्तर्राष्टीय प्रेरणा पुरूष बने। हमें निराशावादी विचार मन में नहीं लाना है। जब सैन्यबल से संगठित गिरोह चलाने वाले अंग्रेज भाग गये तो गुटवाजियों में बंटे अपराधियों की वैशाखी का सहारा लिए हुए लोग राजनीति को कब तक अगुवा कर रख सकते हैं? जरूरत जनता की हुंकार भरने की है। युवा शक्ति क्षणभर के लिए भौतिक सुखों की कल्पना छोड़ दे और कल्पना के कैनवास पर अपने को समाज व राष्ट के प्रेरणा पुरूष की पहचान के रूप में प्राप्त आदर सम्मान को देखे।
परिस्थितियां लगभग सभी दलों में समान हैं। नेता भाषण में महापुरूषों के विचारों को उद्धरित करते हुए समाजवाद, साम्यवाद की व्याख्या करते हैं। गरीबी के आंकड़े देकर शोषण मुक्त समाज का वादा करते हैं। सभा समाप्त कर पूंजीवादी व्यवस्था के प्रतीक के घर जाकर चाय पीते हुए निज आर्थिक हितों के तोल-मोल की बातें करते हैं। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कोई पांखडी बाबा प्रवचन में श्रोतागण को माया मोह से दूर ईश्वर की शरण में जाने की आध्यात्मिक शिक्षा देते हुए धन को सभा स्थल पर लगे दान पात्रों में डाल देने की प्रेरणा देता है। अब बाबा भी कॉरपोरेट कल्चर के होकर प्रकाशन, दवा उद्योग तथा ओडियो-वीडियो निर्माण क्षेत्र में उतर आए हैं।
विषय पर सीधे आते हुए राजनीति को दल-दल की कैद से मुक्त कराकर १२० करोड़ लोगों के हित के लिए औजार बनाने की तरकीब पर सोचें। इसे तीसरी क्रान्ति की शुरूआत का नाम दिया जा सकता है। मैंने लोकनायक जयप्रकाश नरायन को ध्यान से सुना, गांधी व लोहिया को ध्यानपूर्वक पढा, अमर शहीद भगत सिंह के संस्मरणों को परिवार से ग्रहण किया, कहीं भी इनकी कल्पना में आजाद भारत में राजनीति को बन्धक बनाने की नहीं थी। मैंने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का नाम इस कड़ी में इसीलिए नही लिया कि व्यवस्था में सुधार लाने तथा जनता को दिशा देने में वे अकेले ही सक्षम थे। यदि वे जीवित रहे होते तो देश के हालात सुधर चुके होते।
सम्पूर्ण क्रान्ति का आव्हन करते हुए लोकनायक ने स्पष्ट कहा था कि जन प्रतिनिधयों को वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए। प्रतिनिधयों को वरीयता क्रम के बहुमत के आधार पर चुना जाये अर्थात् मतदाता की पसन्द के क्रम के आधार पर गणना उस समय तक हो जब तक एक प्रतिनिधि मतदाताओं का स्पष्ट बहुमत प्राप्त न कर ले। यह व्यववस्था कुछ कुछ अमेरीका की चुनाव प्रणाली से मेल खाती है जहां उम्मीदवार को मुख्य चुनाव में उतरने से पूर्व अपने दल के सदस्यों का बहुमतीय विश्वास प्राप्त करना होता है। वापस बुलाने का अधिकार तो भारतीय दर्शन की दूरगामी क्रिया तथा परिपक्वता का वह बिन्दू है जहां व्यवस्था दोष मुक्ति एवं निर्मल होकर जाती है। वैसे कोई भी व्यवस्था कभी अन्तिम नहीं होती उसमें परिवर्तन का गुण सदैव बना रहना चाहिए।
परन्तु, दोष शोधन इस व्यवस्था में भी पूर्ण रूप से नहीं होता। लोकतंत्र का स्वररूप तभी निखरेगा जब दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र स्थापित होगा। इसके लिए डा० लोहिया का हिमालयी कलेजा चाहिए जो पार्टी मंच पर अपनी आलोचना को उकसायें। आज लगभग सभी दलों के अध्यक्ष आजीवन हैं। भले ही चुनाव आयोग की औपचारिकताओं के कारण निश्चित समयान्तर से उनकी चुनाव प्रक्रिया दिखाने के लिए पूरी करा ली जाती है। जहाँ अध्यक्ष आजीवन नहीं है वहां दल के ऊपर उनका नीति निर्धारक संचालक मंडल अध्यक्ष के नाम का फैसला करता है। कभी कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए वास्तविक मतदान होता था। सत्तर के दशक तक समाजवादी दलों में इस प्रकार का लोकतन्त्र था।
जब दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र् ही नहीं तो उम्मीदवार कैसे छन कर आएगा? टिकट पद्धति ने भारतीय युवाओं में कुंठा पैदा कर दी है। वे या तो कॉरपोरेट सेक्टर के सलाना मोटे लिफाफों की ओर दौड़ रहे है या नेता की शरण में चापलूस होकर टिकट की भीख मांग रहे है। वैसे मुझे इनका मन भी साफ दिखाई नहीं देता। मैं हर युवा को राजनीति में लाने का पक्षधर हूं। जब इस सम्बन्ध में बात की जाती है तो राजनीति प्रताड़ना का आरोप लगाकर युवक अपनी अनिच्छा प्रकट कर देता है। किन्तु, वही युवा व्योरेक्रेसी में जाने को उतावला है जहां इससे कहीं अधिक प्रताड़ना सत्तादल के लोगों से सहनी पड़ती है। दोनों ही परिस्थितयां घातक हैं। शरणागत प्रवृत्ति राजनीति में नये रक्त का संचार रोक रही है और नेताओं के रोब से डरा हुआ अफसर व्यवस्था में सड़न पैदा कर रहा है।
चुनाव प्रक्रिया क्या हो? वर्तमान व्यवस्था में विचारवान् युवा टिकट नहीं पा सकता। उससे पार्टी के नेता को खतरा है। घन कुबेर को वह भायेगा नहीं, तुरन्त दस आरोप लगाकर चुगली कर दी जायेगी। विचारवान् नेताओं का दल के नेताओं से वैसे भी सम्पर्क अब टूटा रहता है। जिस प्रकार द्वारपाल की मुट्ठी गरम किए बिना अधिकारी से साक्षात्कार कठिन है वैसे ही नेताओं के निजी स्टाफ की कृपा प्राप्त करे बगैर नेता के दर्शन सुलभ नहीं होते। नेताओं की गणेश परिक्रमा से अधिक उनके स्टाफ की परिक्रमा करने के दृष्टान्त पार्टी कार्यालय में मिल जाते हैं।
ऐसे समय में तीसरी क्रान्ति के लिए कैसे खड़ा हुआ जाये? राजनीति को बन्धन मुक्त करने के लिए मुहिम चलाना पडेगा। 1942 और 1974 की की तरह निगाहें पुन: युवा शक्ति पर है। पुलिस या प्रशासनिक अफसर बनने के लिए भी तो दो वर्ष कठोर परिश्रम के गुजारने होते हैं। देश का भाग्य विधाता बनना है तो मुट्ठी भींचकर हाथ ऊपर उठा संकल्प ले लें कि ”जन-जन की लालन पालनी राजनीति मां को बन्धन मुक्त करना है। भारत मां की गुलामी की बेड़ियां गांधी के नेतृत्तव में हुए आन्दोलन की धार से कट गयीं अब 120 करोड़ जनता की देखभाल करने वाली विधाता मां यानी ”राजनीति” को बन्धन मुक्त कराना है।” राजनीति को इस हद तक गुलाम बना दिया गया है कि आपके क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए बाहर से विजूना लाकर भी राजनीतिक दल खड़ा कर देते हैं।
मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि एम०एल०ए० व एम०पी० को पार्टी की नीतियों को बताने के लिए कोई प्रश्नावली दे दी जाये तो अधिकांश बता नही पायेंगें। ऊपरी सदन जिसका गठन बुद्धिजीवी वर्ग के लिए हुआ, वहां चुनाव से तिस्कृत अथवा पूंजीवादी विग्रहों का यथास्थान समायोजन होने लगा है। क्या करना है यह एक विचारणीय प्रश्न है? अब 1942 की तरह न तो आन्दोलन हो सकते हैं न जरूरत है। स्वतन्त्र भारत की कुल jk”Vªh; सम्पत्ति हमारी अपनी है। उसको क्षति पहुचाना आत्मघाती है। हिंसा तो निजी जीवन से लेकर आन्दोलन तक कहीं भी कतई भी नहीं होनी चाहिए। केवल, संगठन, आपसी जुड़ाव व विचार परिपक्वता को हथेली पर रखकर संकल्प लें ले कि मैं राजनीति की छनन प्रक्रिया में हिस्सा लूंगा। मेरा लक्ष्य देश को निर्मल राजनीति देना है। मैं अपने क्षेत्र से दलों का थोपा हुआ नहीं वरन् जनता के दुख दर्द को समझने वाला व्यक्ति का चुनाव करूंगा जिसमें इतना हौंसला हो कि अपनी पार्टी की जन विरोधी नीतियों का विरोध कर सके। जो अपने दल के नेता के सत्ता समीकरण में जोड़ तोड़ का गणित बैठाने में भूमिका न निभाये। प्रत्येक युवा संकल्प ले कि ऐसा व्यक्ति ”मैं हूं”, मैं इस गुणों का आत्मसात् कर चुका हूं। मैंने राजनैतिक विचारों का अध्ययन कर लिया है। मैं सामाजिक व आर्थिक विषयों पर गम्भीर टिप्पणियां कर सकता हूं। मैं व्यवस्था को भली भांति समझ चुका हूं। इसमें लगी भ्रष्टाचार की कड़ियों को पहचानता हूं जिसे निकाल फेंकने के लिए मैं जनता के प्रति वचनबद्ध हूं।
राजनीति का रूप क्या हो यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है? लालन पालन करने वाली मां का रूप क्या है? वह आभूषणों से कैसे सुसज्जित होगी? उसके माथे पर कौन सा तिलक होगा? कितनी भुजायें और प्रत्येक में क्या-क्या होगा ये सब प्रश्न अर्थहीन इसलिए हैं कि हमारा इस मां का रूप निर्गुण है। वह सभी के साथ समान व्यवहार करने वाली है। वह कमजोर बच्चे को विशेष पौष्टिक पदार्थ देती है तथा ताकतवर से धर्म व सीमा की रक्षा को कहती है। उसकी अनुभूति हमारे अन्दर है। वह दिखाई नहीं देती इसीलिए रंग और रोली हमारे लिए निरर्थक हैं। वह किसी को किसी पूजा स्थल पर जाने से नहीं रोकती साथ ही जाने के लिए बाध्य भी नहीं करती है। उसे आभूषण नहीं चाहिए इसीलिए किसी भी प्रकार का आर्थिक दोहन समाप्त कर दो।

गोपाल अग्रवाल

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